Monday, April 20, 2009

स्वर्ग से विदाई

भाईयों और बहनों!

अब ये आलिशान इमारत
बन कर तैयार हो गयी है.
अब आप यहाँ से जा सकते हैं.
अपनी भरपूर ताक़त लगाकर
आपने ज़मीन काटी
गहरी नींव डाली,
मिटटी के नीचे दब भी गए.
आपके कई साथी.

मगर आपने हिम्मत से काम लिया
पत्थर और इरादे से,
संकल्प और लोहे से,
बालू, कल्पना और सीमेंट से,
ईंट दर ईंट आपने
अटूट बुलंदी की दीवार खड़ी की.
छत ऐसी कि हाथ बढाकर,
आसमान छुआ जा सके,
बादलों से बात की जा सके.
खिड़कियाँ क्षितिज की थाह लेने वाली,
आँखों जैसी,
दरवाजे, शानदार स्वागत!

अपने घुटनों और बाजुओं और
बरौनियों के बल पर
सैकडों साल टिकी रहने वाली
यह जीती-जागती ईमारत तैयार की
अब आपने हरा भरा लान
फूलों का बागीचा
झरना और ताल भी बना दिया है
कमरे कमरे में गलीचा
और कदम कदम पर
रंग-बिरंगी रौशनी फैला दी है
गर्मी में ठंडक और ठण्ड में
गुनगुनी गर्मी का इंतजाम कर दिया है

संगीत और न्रत्य के
साज़ सामान
सही जगह पर रख दिए हैं
अलगनियां प्यालियाँ
गिलास और बोतलें
सज़ा दी हैं
कम शब्दों में कहें तो
सुख सुविधा और आजादी का
एक सुरक्षित इलाका
एक झिलमिलाता स्वर्ग
रच दिया है

इस मेहनत
और इस लगन के लिए
आपकी बहुत धन्यवाद
अब आप यहाँ से जा सकते हैं.
यह मत पूछिए की कहाँ जाए
जहाँ चाहे वहां जाएँ
फिलहाल उधर अँधेरे में
कटी ज़मीन पर
जो झोपडे डाल रखें हैं
उन्हें भी खाली कर दें
फिर जहाँ चाहे वहां जाएँ.

आप आज़ाद हैं,
हमारी जिम्मेदारी ख़तम हुई
अब एक मिनट के लिए भी
आपका यहाँ ठहरना ठीक नहीं
महामहिम आने वाले हैं
विदेशी मेहमानों के साथ
आने वाली हैं अप्सराएँ
और अफसरान
पश्चिमी धुनों पर शुरू होने वाला है
उन्मादक न्रत्य
जाम झलकने वाला है
भला यहाँ आपकी
क्या ज़रुरत हो सकती है.
और वह आपको देखकर क्या सोचेंगे
गंदे कपडे,
धुल से सने शरीर
ठीक से बोलने और हाथ हिलाने
और सर झुकाने का भी शऊर नहीं
उनकी रुचि और उम्मीद को
कितना धक्का लगेगा
और हमारी कितनी तौहीन होगी
मान लिया कि इमारत की
ये शानदार बुलंदी हासिल करने में
आपने हड्डियाँ लगा दीं
खून पसीना एक कर दिया
लेकिन इसके एवज में
मजदूरी दी जा चुकी है
अब आपको क्या चाहिए?
आप यहाँ ताल नहीं रहे हैं
आपके चेहरे के भाव भी बदल रहे हैं

शायद अपनी इस विशाल
और खूबसूरत रचना से
आपको मोह हो गया है
इसे छोड़कर जाने में दुःख हो रहा है
ऐसा हो सकता है
मगर इसका मतलब यह तो नहीं
कि आप जो कुछ भी अपने हाथ से
बनायेंगे,
वह सब आपका हो जायेगा
इस तरह तो ये सारी दुनिया
आपकी होती
फिर हम मालिक लोग कहाँ जाते
याद रखिये
मालिक मालिक होता है
मजदूर मजदूर
आपको काम करना है
हमे उसका फल भोगना है
आपको स्वर्ग बनाना है
हमे उसमें विहार करना है
अगर ऐसा सोचते हैं
कि आपको अपने काम का
पूरा फल मिलना चाहिए
तो हो सकता है
कि पिछले जन्म के आपके काम
अभावों के नरक में
ले जा रहे हों
विश्वास कीजिये
धर्म के सिवा कोई रास्ता नहीं
अब आप यहाँ से जा सकते हैं

क्या आप यहाँ से जाना ही
नहीं चाहते ?
यहीं रहना चाहते हैं,
इस आलिशान इमारत में
इन गलीचों पर पाव रखना चाहते हैं
ओह! ये तो लालच की हद है
सरासर अन्याय है
कानून और व्यवस्था पर
सीधा हमला है
दूसरों की मिलकियत पर
कब्जा करने
और दुनिया को उलट-पुलट देने का
सबसे बुनियादी अपराध है
हम ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे
देखिये ये भाईचारे का मसला नहीं हैं
इंसानीयत का भी नहीं
यह तो लडाई का
जीने या मरने का मसला है
हालाँकि हम खून खराबा नहीं चाहते
हम अमन चैन
सुख-सुविधा पसंद करते हैं
लेकिन आप मजबूर करेंगे
तो हमे कानून का सहारा लेने पडेगा
पुलिस और ज़रुरत पड़ी तो
फौज बुलानी होगी
हम कुचल देंगे
अपने हाथों गडे
इस स्वर्ग में रहने की
आपकी इच्छा भी कुचल देंगे
वर्ना जाइए
टूटते जोडों, उजाड़ आँखों की
आँधियों, अंधेरों और सिसकियों की
मृत्यु गुलामी
और अभावों की अपनी
बेदरोदीवार दुनिया में
चुपचाप
वापिस
चले जाइए!

-गोरख पाण्डेय

सोचो तो

सोचो तो

बिलकुल मामूली चीजें हैं
आग और पानी
मगर सोचो तो कितना अजीब लगता है
होना
आग और पानी का
जो विरोधी हैं
मगर मिलकर पहियों को गति देती है

वैसे, सोचो तो अँधेरे में चमकते
ये हजारों हाथ हैं
इतिहास के पहियों को
रोटी-रचना और मुक्ति के
पड़ावों की और बढ़ाते हुए
इतिहास की किताबों में
इनका जिक्र भी ना होना
सोचो तो कितना अजीब है

सोचो तो
मामूली तौर पर
जो अनाज उगाते हैं
उन्हें दो जून अन्न ज़रूर मिलना चाहिए
उनके पास कपडे ज़रूर होने चाहिए
जो उन्हें बुनते हैं
और उन्हें प्यार मिलना ही चाहिए
जो प्यार करते हैं
मगर सोचो तो
यह भी कितना अजीब है
कि उगाने वाले भूखें रहते हैं
और उन्हें पचा जाते हैं,
चूहे और बिस्तरों पर
पड़े रहने वाले लोग
बुनकर फटे चीथडों में रहते हैं,
और अच्छे से अच्छे कपडे
प्लास्टिक की मूर्तियाँ पहने होती हैं
गरीबी में प्यार भी नफरत करता हैं
और पैसा नफरत को भी
प्यार में बदल देता है

सोचो इस तरह कितनी अजीब और
कभी-कभी एकदम उलटी
होती हैं चीज़ें
जिन्हें हम मामूली समझकर चलते हैं

वैसे, सोचो तो सोचने को
बहुत कुछ है मगर सोचो तो
यह भी कितना अजब है
कि हम सोच सकते हैं
मसलन हम सोच सकते हैं
कि फसल ज़मींदारों के बिना भी
उग सकती है
जैसे परमाणु अस्त्रों के बिना भी
कायम हो सकती है शाँति
जो कल कारखाने अपने हाथों से चलाते हैं,
वे उनके मालिक भी हो सकते हैं
पानी जोकों के बिना भी बहता रह सकता है
और आग झोपडे जलाने के लिए नहीं
बल्कि ठण्ड से कापते लोगों को
बचाने के काम आ सकती है

सोचो तो सिर्फ सोचने से
कुछ होने-जाने का नहीं
जबकि करने को पड़े हैं,
उलटी चीज़ों को उलट देने जैसे जरूरी
और ढेर सारे काम

वैसे, सोचो तो यह भी कितना अजीब है
कि बिना सोचे भी
कुछ होने जाने का नहीं
जबकि
होते हो
इसीलिए सोचते हो.

-गोरख पाण्डेय

सबसे खतरनाक होता है

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी लोभ की मुठ्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती

बैठे सोये पकडे जाना - बुरा तो है
डर से चुप रह जाना - बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता .

कपट के शोर में
सही होने पर दब जाना, बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढना - बुरा तो है
किटकिटा कर समय काट लेना - बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता .

सबसे खतरनाक होता है
बेजान शांति से भर जाना
ना होना तड़प का, सब सहन कर लेना
घर से निकलना काम पर
और काम से घर लौट आना,
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनो का मर जाना.

सबसे खतरनाक वो घडी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है .

सबसे खतरनाक वो आँख होती है
सब कुछ देखते हुए भी जो ठंडी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चींजों से उठती अंधेपन की भाप पर फिसल जाती है
जो नित दिख रही साधारणता को पीती हुई
एक बेमतलब दोराह की भूल-भुलैया में खो जाती है.

सबसे खतरनाक वो चाँद होता है
जो हर कत्ल काण्ड के बाद
सूने आँगन में निकलता है
पर तुम्हारी आँखों में मिर्चों सा नहीं चुभता.

सबसे खतरनाक वो गीत होता है
तुम्हारे कानों तक पहुचने के लिए
जो विलाप लांघता है
डरे हुए लोगों के दरवाजों सामने
जो नसेड़ी की खांसी खांसता है.

सबसे खतरनाक वो दिशा होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाता है.
और उसकी मरी हुई धुप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में उतर जाए.

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी लोभ की मुठ्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती

-शहीद अवतार सिंह पाश

(एक लम्बी कविता से)

Saturday, March 14, 2009

गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे

गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे,
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे ।

रात कारी, दिन उजियारा
मिल गए दोनों साए,
सांझ ने देखो रंग-रूप के
कैसे भेद मिटाए रे
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे ।

कांच कोई, माटी कोई, रंग-बिरंगे प्याले
प्यास लगे तो एक बराबर
जिसमे पानी डाले रे
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे ।

नाम कोई, बोली कोई,
लाखों रूप और चेहरे,
खोल के देखो प्यार की आखें,
सब तेरे सब मेरे रे,
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे ।

गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे,
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे ।

-काबुलीवाला

Friday, December 5, 2008

Which side I am on ?

“I don’t take sides because there are no sides... the only side I am on is ‘This will continue if we don’t learn to forgive’। When you take sides you only see one perspective, and that misleads.”

-Anurag Kashyap

Wednesday, December 3, 2008

मुंबई अटैक !

मुंबई अटैक! जिसने न जाने कितने ही बेक़सूर, बेगुनाह लोगों की ज़िन्दगी में हलचल मचा दी। वैसे कोई नईं बात तो नही है ऐसे ही मर जाना हमारे देश में लोगों का। हाँ पर मारने का तरीका एकदम चौकाने वाला था। इस बार देश की औधोदिक राजधानी को निशाना बनाया गया है और उसमे भी "होटल ताज" जैसी जगह को जिसे की हमारी मीडिया हम भारतियों के गौरव और सम्मान का प्रतीक बता रही है। वैसे यह मुझे इन हमलों के बात ही पता चला कि होटल ताज का हम देशवासियों के लिए कितना महत्व है।

हमारा देश आज शर्मशार है क्योंकि वो बाहर से आए हमारे विदेशी मेहमानों को सुरक्षा मुहैया नही करवा पाया, जोकि होना भी चाहिए। पर काश हमें थोडी शर्म भुकमरी से हमारे देश में मर रहे बच्चों की बात पर भी आ जाती। खैर इन बातों को अभी छोड़ भी दे और इस हमले की ही बात पर गौर करें तो सारी ऊँगलियाँ हमेशा की तरह पाकिस्तान पर उठायीं जा रही है। जैसा कि सियासती गहमा गहमी से साफ़ है, माहौल भी ऐसा बनता नज़र आ रहा है जैसा कि 9/11 के बाद अमेरिका में अफगानिस्तान के ख़िलाफ़ बन रहा था । चलिए यह बात मान भी लें कि आतंकवादियों ने ट्रेनिंग पाकिस्तान में ली और उसमें उनकी सेना के कुछ लोग भी शामिल रहे थे, पर इसका यह मतलब तो नही कि हम अपनी तरफ़ से पाकिस्तान में चल रहे कैम्पस पर हमला कर दें। और वो भी तब जबकि उस देश के साथ युद्ध का खतरा हो। आज जब समय हमें पाकिस्तान जो ख़ुद आतंकवाद से लड़ रहा है को साथ लेकर इस समस्या से निपटने का है तो इस तरह के विकल्पों पर सोचना बेवकूफी ही होगी।

कुछ लोग इस धारणा को मानते हैं कि हमें पाकिस्तान पर हमला करना चाहिए क्योंकि अमेरिका के अफगानिस्तान पर ऐसा करने के बाद आज तक अमेरिका में कोई बड़ा हमला नही हुआ। उनसे मैं बस यहीं कहना चाहूँगा कि भले ही अमेरिका में कोई हमला नही हुआ पर भारत में तो हुआ। जब मुंबई जल रही थी तो पाकिस्तान में भी बोम्ब फट रहे थे। तो अमेरिका के अफगानिस्तान पर हमले के बाद so called global terror तो कम नही ही हुआ। बल्कि एकदम अलग ही रूप लेकर हमारे सामने आ खड़ा हुआ है। तो यह मान लेना कि पाकिस्तान में चल रहे कैम्पस पर हमला करके हम अपने देश से आतंकवाद को ख़तम कर देंगे, मेरी समझ से तो एक बड़ी भूल है। अगर हमला किया जाता है तो वो बस एक escape route होगा सरकार/ नेताओं के लिए कि उन्होंने कुछ कर दिया है। राजनेता इस बात का सहारा लेकर अपनी नाकामयाबियों पर परदा दाल देंगे और सारा इल्जाम किसी और देश पर मढ़ दिया जाएगा।

आतंकवादी हमलों से यहाँ भी आम जनता मरी है और वहां भी आम जनता ही मरेगी। कैम्पस में आतंकवादी बैठे नही होंगे, भारतीय हमलों के इंतज़ार में। आतंकवादियों के ख़त्म होने की बात तो दूर, हमले करके हम आतंकवादियों कि ज़मात में कई नाम और जुडवा देंगे।

लम्बी बीमारियों का इलाज़ लंबा होता है। आतंकवाद की समस्या नयी नही है। पर बदकिस्मती ये कि पुराना मर्ज़ होने के बाद भी लोग उसका सही इलाज़ नही ढूँढ पा रहे है। समाज में हर तरफ़ असमानता व भेदभाव है। जिस एक धर्म को इन attacks से जोड़ कर उसे इस्लामिक terrorism का नाम दे दिया गया है, उस धर्म के लोगों की क्या हालत है हमारे समाज में यह किसी से छुपी नही है। लोग कहते हैं ऐसी हालत तो और भी धर्मों को मानने वाले लोगों की है, कई मायनों में उनमे समानता है।

हाँ है, पर उन धर्मों को मानने वाले लोगों को हम terrorist नही बुलाते। उन्हें किराए पर घर और नौकरियां देने से नही हिचकिचाते। उन्हें एक साथ खड़ा देखकर आप सोच में नही पड़ जाते। 100 लोगों की भीड़ से सिर्फ़ एक दाढी और पजामे वाले को ही रोककर उसकी तलाशी नही लेते। दो लोगों का किसी घटना में नाम आने पर उनके गांवों/ शहरों/कॉलेज को आतंकगढ़ का नाम नही दे देते। उनके गली मोहल्लों को मिनी पाकिस्तान नही कहते । उनके केस लड़ने वाले वकीलों की पिटाई नही करते।

कहाँ है समानता? कहाँ है समान न्याय? कैसे रोक सकेंगे हम आतंकवाद को, आंखों में पट्टी बांधकर, बिना न्याय के। और न्याय करना क्या सिर्फ़ अदालतों का काम है? कब हम एक दूसरे से न्याय करना सीखेंगे। कब एक देश के आम आदमी दूसरे देश के आम आदमी से न्याय करना सीखेंगे? कब हम यह जानेंगे कि आतंकवाद से लड़ने की चाबी सरकारों के पास नही, हमारे पास है?

हमारे देश में कई लोगों को पाकिस्तान पर हमला कर आतंकवाद मिटाने की बात का समर्थन करते देखकर तो ऐसा नही लगता की वो दिन पास है। मेरे लिए तो पाकिस्तान में हमला होने की सूरत में मरने वाला आम आदमी भी उतना ही अज़ीज़ होगा जितना कि मुंबई या भारत में कहीं और हुए हमले में मरे लोग।