Thursday, February 24, 2011

कुत्ते

ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
कि बख़शा गया जिन्हें ज़ौके-गदाई ( भीख माँगने का काम )
ज़माने की फटकार सरमाया ( दौलत ) इनका
जहाँ भर की दुत्कार इनकी कमाई
ना आराम शब को ना राहत सवेरे
गलाज़त ( गन्दगी ) में होते हैं इनके बसेरे
जो बिगड़ें तो एक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकर खाने वाले
ये फ़ाकों से उकता के मर जाने वाले
ये मज़लूम मख़लक ( जनता ) गर सर उठाये
तो इंसान सब सरकशी (घमंड ) भूल जाए
ये चाहें तो दुनियां को अपना बना लें
ये आकाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
कोई इनको एहसासे-ज़िल्लत दिला दे
कोई इनकी सोई हुई दम हिला दे

-फैज़

Sunday, December 19, 2010

यादें

याद है मुझे वो घर,
जिसके आँगन में, ठण्ड के मौसम में
गुनगुनी धूप बिखरी रहती थी,
जो सरकती रहती थी पल-पल,
और साथ उसके खटिया भी
जिस पर मैं लेटा रहता था..
वो धूप जब दीवार पर टंग जाती,
तो सोचा करता,
काश मैं भी दीवार पर खटिया डालकर सो सकता..और कुछ देर...

उस घर के आँगन में
एक पेड़ था, हरा, कटहल का..
माँ बताती कि किसी ने उस पेड़ में
लोहे की कील ठोक दी है
जो फलता नहीं वो..
फिर भी
आँगन के एक कोने में खड़ा वो पेड़
बहुत सुन्दर था..
मुझे हमेशा लगता
उस पेड़ की जड़ों के पास साँपों की बाम्बी है
और उसमें रहने वाले सांप मेरे रक्षक हैं..
उस पेड़ की जड़ों के पास ही हम नारियल फोड़ते,
सफ़ेद रसगुल्लों से भरे वो टिन के डिब्बे खोलते
जो शायद अब बाज़ार में नहीं मिलते..
दिवाली के दिन पूजी गई मिट्टी की मूर्तियाँ
नदी में सिराने से पहले
कई दिनों तक उसी पेड़ की
जड़ों के पास पड़ी रहतीं..गलती रहतीं...

उस आँगन में पापा ने
एक झूला भी लगवाया था,
जिस पर मैं, मेरी बहन और मोहल्ले के दोस्त
अकसर ही चढ़े रहते थे..
मैं उस पर बैठ कर झूलता तो मुझे चक्कर आता...

उस आँगन से सटे दो कमरे थे,
जिनमें से एक रसोई थी..
दूसरा कमरा मुझे डरावना लगता,
इतना कि दिन में भी मुझे उसमे अकेले जाते डर लगता..
पर रसोई,
वो तो केंद्र थी घर का..
स्कूल से लौटते ही
हम घर में फ़ैली गंध पहचनाने की कोशिश करते..
कि माँ ने आज क्या पकाया होगा..
माँ जब शाम को रसोई में
कोयले की सिगड़ी पर रोटियां सेंकती..
तो हम उसके साथ रसोई में ही बैठकर
स्कूल का काम कर लेते..
फिर माँ से आटा मांगकर,
कभी उससे कछुआ बनाते तो कभी चिड़िया,
और फिर रख देते उन्हें सिगड़ी के अन्दर,
पकने के लिए..
अकसर ही कच्चे रह जाते थे वो..भीतर से...

रसोई से संटा हुआ था
सोने का कमरा..
हम सभी साथ ही सोते वहां..
मैं और मेरी बहन,
दोनों ही पापा के बगल में सोना चाहते..
वो हमें अपने दोनों और लिटा लेते और
कहानियां सुनाते..
ऊपर छत को देखते हुए..
क्यूंकि हम दोनों ही जिद्द करते
हमारी ओर देखकर कहानी सुनाने की..
मेरी बहन ने मुझे याद दिलाया
कैसे वो एक दफा भोपाल गए थे..
और हम दोनों ही
उनका तकिया पकड़ कर सोये थे..
शायद रोये भी थे...

और मुझे याद है एक वाकया,
जब मैं घर पर अकेला था..
दरवाज़े के ऊपर टंगी
भगवान् की फोटो के सामने
हाथ जोड़कर रो रहा था..
एक टीचर ने परीक्षा के दौरान
मेरी कॉपी से देखकर किसी बच्चे को
कुछ उत्तर बताये थे..
मैं भगवान् से मना रहा था
उस बच्चे के मुझसे ज्यादा नंबर ना आयें...

कितना अजीब था बचपन..मेरा..
शायद हर किसी का होता है..
अनोखा...

मन के किसी कोने में
ना जाने कहाँ छुपकर
यादें रहती हैं..
कभी जब मन भारी होता है..
तो बरसने लगती हैं......

Saturday, February 20, 2010

कुछ आंकड़े

1) Incidents of Terrorist attack 1999-2008 - 61301
Number of Deaths- 18360

http://www.lead.timesofindia.com/MediaRoom.aspx?URLName=LeadIndia09.a...
http://www.easydriveforum.com/showthread.php?t=2214

2) Deaths due to road accidents in India - 250/daily
In 10 years - more than 900000

1,05,749 deaths in the year 2006 alone

http://www.easydriveforum.com/showthread.php?t=2214
http://www.merinews.com/article/road-accident-deaths-highest-in-india...

3) Farmers Suicide in past 10 years - 200000

4) Occupational deaths - 47000 in the year 2003 alone

http://www.ilo.org/global/About_the_ILO/Media_and_public_information/...

5) Deaths because of TB - 331268 in 2006 alone.

http://www.searo.who.int/en/Section10/Section2097/Section2100_14797.htm
http://www.who.int/inf-new/tuber3.htm

6)At the very least, 22327 die every year cleaning sewage.

http://www.tehelka.com/story_main36.asp?filename=Ne081207DYING.asp

7) people died in 26/11 - 195

8) 1,200 people were killed in violence linked to the insurgency in 2009

http://beta.thehindu.com/news/national/article145699.ece?homepage=true

Tuesday, May 12, 2009

मैं चाहता हूँ कि स्पर्श बचा रहे

मैं चाहता हूँ कि स्पर्श बचा रहे

वह नहीं जो कंधे छीलता हुआ

आततायी की तरह गुज़रता है

बल्कि वह जो एक अनजानी यात्रा के बाद

धरती के किसी छोर पर पहुँचने जैसा होता है

मैं चाहता हूँ स्वाद बचा रहे

मिठास और कड़वाहट से दूर

जो चीज़ों को खाता नहीं है

बल्कि उन्हें बचाए रखने की कोशिश का

एक नाम है

एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है

मसलन यह कि हम इंसान हैं

मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सचाई बची रहे

सड़क पर जो नारा सुनाई दे रहा है

वह बचा रहे अपने अर्थ के साथ

मैं चाहता हूँ निराशा बची रहे

जो फिर से एक उम्मीद

पैदा करती है अपने लिए

शब्द बचे रहें

जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते

प्रेम में बचकानापन बचा रहे

कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा ।

(1993)

-मंगलेश डबराल

अपनी असुरक्षा से


अगर देश की सुरक्षा ऐसे ही होती है
कि बेज़मीरी ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाए
आँख की पुतली में "हाँ" के अलावा कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुक जाए
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

हम तो समझे थे देश को घर सी पवित्र चीज़
जहाँ घुटन नहीं होती
मनुष्य बहती बारिश की गूँज के तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है
हम तो समझे थे देश को आलिंगन जैसे एक अहसास का नाम
हम तो देश को समझे थे मेहनत जैसा नशा कोई
हम तो देश को समझे थे कुर्बानी जैसे वफ़ा
पर जो देश
रूह की ललकार का कारखाना है
पर जो देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे खतरा है

अगर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्जे के पहाडों पर गिरते पत्थरों की तरह टूटता रहे वजूद हमारा
कि तनख्वाहों के मुंह पर थूकती
कीमतों की बेशुमार हंसी
कि अपने लहू में नहाना ही तीर्थ का पुन्य होता है
तो हमें अमन से खतरा है

अगर देश के सुरक्षा ऐसी ही होती है
कि हर हड़ताल को दबाकर अमन को रंग चढ़ता है
कि वीरगति बस सीमायों पर मर के परवान चढ़ती है
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलता है
अफल हुकूमत के कुँए पर जुटकर ही धरती सींचेगी
मेहनत को राजमहल के दरवाज़े पर दस्तक ही बनना है
तो हमें देश के सुरक्षा से खतरा है

-पाश

Tuesday, April 21, 2009

एक दोहा तुलसीदास का

तुलसी सरनाम, गुलाम है रामको, जाको चाहे सो कहे वोहू.
मांग के खायिबो, महजिद में रहिबो, लेबै को एक देबै को दोउ.

(मेरा नाम तुलसी है, मैं राम का गुलाम हूँ, जिसको जो मन कहे कहता हूँ, मांग के खाता हूँ, मस्जिद में रहता हूँ, न किसी से लेना, न किसी को देना.)

-तुलसीदास, (विनय चरितावली)

तुलसीदास, राम के परमभक्त थे. उन्होंने अपनी रचनाये, संस्कृत में नहीं, साधारण लोगों में प्रचलित अवधी भाषा में की, जिससे वो सब लोगों तक पहुचेइसी कारण उस समय के ब्राह्मण उनकी गिनती अपने बीच नहीं करते थेतुलसीदास ब्राह्मणों द्वारा मंदिर से निकाले जाने के बाद अयोध्या की एक मस्जिद में रहते थे

- पुस्तक "झूठ और सच" से (राम पुनियानी)

Monday, April 20, 2009

स्वर्ग से विदाई

भाईयों और बहनों!

अब ये आलिशान इमारत
बन कर तैयार हो गयी है.
अब आप यहाँ से जा सकते हैं.
अपनी भरपूर ताक़त लगाकर
आपने ज़मीन काटी
गहरी नींव डाली,
मिटटी के नीचे दब भी गए.
आपके कई साथी.

मगर आपने हिम्मत से काम लिया
पत्थर और इरादे से,
संकल्प और लोहे से,
बालू, कल्पना और सीमेंट से,
ईंट दर ईंट आपने
अटूट बुलंदी की दीवार खड़ी की.
छत ऐसी कि हाथ बढाकर,
आसमान छुआ जा सके,
बादलों से बात की जा सके.
खिड़कियाँ क्षितिज की थाह लेने वाली,
आँखों जैसी,
दरवाजे, शानदार स्वागत!

अपने घुटनों और बाजुओं और
बरौनियों के बल पर
सैकडों साल टिकी रहने वाली
यह जीती-जागती ईमारत तैयार की
अब आपने हरा भरा लान
फूलों का बागीचा
झरना और ताल भी बना दिया है
कमरे कमरे में गलीचा
और कदम कदम पर
रंग-बिरंगी रौशनी फैला दी है
गर्मी में ठंडक और ठण्ड में
गुनगुनी गर्मी का इंतजाम कर दिया है

संगीत और न्रत्य के
साज़ सामान
सही जगह पर रख दिए हैं
अलगनियां प्यालियाँ
गिलास और बोतलें
सज़ा दी हैं
कम शब्दों में कहें तो
सुख सुविधा और आजादी का
एक सुरक्षित इलाका
एक झिलमिलाता स्वर्ग
रच दिया है

इस मेहनत
और इस लगन के लिए
आपकी बहुत धन्यवाद
अब आप यहाँ से जा सकते हैं.
यह मत पूछिए की कहाँ जाए
जहाँ चाहे वहां जाएँ
फिलहाल उधर अँधेरे में
कटी ज़मीन पर
जो झोपडे डाल रखें हैं
उन्हें भी खाली कर दें
फिर जहाँ चाहे वहां जाएँ.

आप आज़ाद हैं,
हमारी जिम्मेदारी ख़तम हुई
अब एक मिनट के लिए भी
आपका यहाँ ठहरना ठीक नहीं
महामहिम आने वाले हैं
विदेशी मेहमानों के साथ
आने वाली हैं अप्सराएँ
और अफसरान
पश्चिमी धुनों पर शुरू होने वाला है
उन्मादक न्रत्य
जाम झलकने वाला है
भला यहाँ आपकी
क्या ज़रुरत हो सकती है.
और वह आपको देखकर क्या सोचेंगे
गंदे कपडे,
धुल से सने शरीर
ठीक से बोलने और हाथ हिलाने
और सर झुकाने का भी शऊर नहीं
उनकी रुचि और उम्मीद को
कितना धक्का लगेगा
और हमारी कितनी तौहीन होगी
मान लिया कि इमारत की
ये शानदार बुलंदी हासिल करने में
आपने हड्डियाँ लगा दीं
खून पसीना एक कर दिया
लेकिन इसके एवज में
मजदूरी दी जा चुकी है
अब आपको क्या चाहिए?
आप यहाँ ताल नहीं रहे हैं
आपके चेहरे के भाव भी बदल रहे हैं

शायद अपनी इस विशाल
और खूबसूरत रचना से
आपको मोह हो गया है
इसे छोड़कर जाने में दुःख हो रहा है
ऐसा हो सकता है
मगर इसका मतलब यह तो नहीं
कि आप जो कुछ भी अपने हाथ से
बनायेंगे,
वह सब आपका हो जायेगा
इस तरह तो ये सारी दुनिया
आपकी होती
फिर हम मालिक लोग कहाँ जाते
याद रखिये
मालिक मालिक होता है
मजदूर मजदूर
आपको काम करना है
हमे उसका फल भोगना है
आपको स्वर्ग बनाना है
हमे उसमें विहार करना है
अगर ऐसा सोचते हैं
कि आपको अपने काम का
पूरा फल मिलना चाहिए
तो हो सकता है
कि पिछले जन्म के आपके काम
अभावों के नरक में
ले जा रहे हों
विश्वास कीजिये
धर्म के सिवा कोई रास्ता नहीं
अब आप यहाँ से जा सकते हैं

क्या आप यहाँ से जाना ही
नहीं चाहते ?
यहीं रहना चाहते हैं,
इस आलिशान इमारत में
इन गलीचों पर पाव रखना चाहते हैं
ओह! ये तो लालच की हद है
सरासर अन्याय है
कानून और व्यवस्था पर
सीधा हमला है
दूसरों की मिलकियत पर
कब्जा करने
और दुनिया को उलट-पुलट देने का
सबसे बुनियादी अपराध है
हम ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे
देखिये ये भाईचारे का मसला नहीं हैं
इंसानीयत का भी नहीं
यह तो लडाई का
जीने या मरने का मसला है
हालाँकि हम खून खराबा नहीं चाहते
हम अमन चैन
सुख-सुविधा पसंद करते हैं
लेकिन आप मजबूर करेंगे
तो हमे कानून का सहारा लेने पडेगा
पुलिस और ज़रुरत पड़ी तो
फौज बुलानी होगी
हम कुचल देंगे
अपने हाथों गडे
इस स्वर्ग में रहने की
आपकी इच्छा भी कुचल देंगे
वर्ना जाइए
टूटते जोडों, उजाड़ आँखों की
आँधियों, अंधेरों और सिसकियों की
मृत्यु गुलामी
और अभावों की अपनी
बेदरोदीवार दुनिया में
चुपचाप
वापिस
चले जाइए!

-गोरख पाण्डेय

सोचो तो

सोचो तो

बिलकुल मामूली चीजें हैं
आग और पानी
मगर सोचो तो कितना अजीब लगता है
होना
आग और पानी का
जो विरोधी हैं
मगर मिलकर पहियों को गति देती है

वैसे, सोचो तो अँधेरे में चमकते
ये हजारों हाथ हैं
इतिहास के पहियों को
रोटी-रचना और मुक्ति के
पड़ावों की और बढ़ाते हुए
इतिहास की किताबों में
इनका जिक्र भी ना होना
सोचो तो कितना अजीब है

सोचो तो
मामूली तौर पर
जो अनाज उगाते हैं
उन्हें दो जून अन्न ज़रूर मिलना चाहिए
उनके पास कपडे ज़रूर होने चाहिए
जो उन्हें बुनते हैं
और उन्हें प्यार मिलना ही चाहिए
जो प्यार करते हैं
मगर सोचो तो
यह भी कितना अजीब है
कि उगाने वाले भूखें रहते हैं
और उन्हें पचा जाते हैं,
चूहे और बिस्तरों पर
पड़े रहने वाले लोग
बुनकर फटे चीथडों में रहते हैं,
और अच्छे से अच्छे कपडे
प्लास्टिक की मूर्तियाँ पहने होती हैं
गरीबी में प्यार भी नफरत करता हैं
और पैसा नफरत को भी
प्यार में बदल देता है

सोचो इस तरह कितनी अजीब और
कभी-कभी एकदम उलटी
होती हैं चीज़ें
जिन्हें हम मामूली समझकर चलते हैं

वैसे, सोचो तो सोचने को
बहुत कुछ है मगर सोचो तो
यह भी कितना अजब है
कि हम सोच सकते हैं
मसलन हम सोच सकते हैं
कि फसल ज़मींदारों के बिना भी
उग सकती है
जैसे परमाणु अस्त्रों के बिना भी
कायम हो सकती है शाँति
जो कल कारखाने अपने हाथों से चलाते हैं,
वे उनके मालिक भी हो सकते हैं
पानी जोकों के बिना भी बहता रह सकता है
और आग झोपडे जलाने के लिए नहीं
बल्कि ठण्ड से कापते लोगों को
बचाने के काम आ सकती है

सोचो तो सिर्फ सोचने से
कुछ होने-जाने का नहीं
जबकि करने को पड़े हैं,
उलटी चीज़ों को उलट देने जैसे जरूरी
और ढेर सारे काम

वैसे, सोचो तो यह भी कितना अजीब है
कि बिना सोचे भी
कुछ होने जाने का नहीं
जबकि
होते हो
इसीलिए सोचते हो.

-गोरख पाण्डेय

सबसे खतरनाक होता है

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी लोभ की मुठ्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती

बैठे सोये पकडे जाना - बुरा तो है
डर से चुप रह जाना - बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता .

कपट के शोर में
सही होने पर दब जाना, बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढना - बुरा तो है
किटकिटा कर समय काट लेना - बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता .

सबसे खतरनाक होता है
बेजान शांति से भर जाना
ना होना तड़प का, सब सहन कर लेना
घर से निकलना काम पर
और काम से घर लौट आना,
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनो का मर जाना.

सबसे खतरनाक वो घडी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है .

सबसे खतरनाक वो आँख होती है
सब कुछ देखते हुए भी जो ठंडी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चींजों से उठती अंधेपन की भाप पर फिसल जाती है
जो नित दिख रही साधारणता को पीती हुई
एक बेमतलब दोराह की भूल-भुलैया में खो जाती है.

सबसे खतरनाक वो चाँद होता है
जो हर कत्ल काण्ड के बाद
सूने आँगन में निकलता है
पर तुम्हारी आँखों में मिर्चों सा नहीं चुभता.

सबसे खतरनाक वो गीत होता है
तुम्हारे कानों तक पहुचने के लिए
जो विलाप लांघता है
डरे हुए लोगों के दरवाजों सामने
जो नसेड़ी की खांसी खांसता है.

सबसे खतरनाक वो दिशा होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाता है.
और उसकी मरी हुई धुप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में उतर जाए.

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी लोभ की मुठ्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती

-शहीद अवतार सिंह पाश

(एक लम्बी कविता से)

Saturday, March 14, 2009

गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे

गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे,
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे ।

रात कारी, दिन उजियारा
मिल गए दोनों साए,
सांझ ने देखो रंग-रूप के
कैसे भेद मिटाए रे
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे

कांच कोई, माटी कोई, रंग-बिरंगे प्याले
प्यास लगे तो एक बराबर
जिसमे पानी डाले रे
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे

नाम कोई, बोली कोई,
लाखों रूप और चेहरे,
खोल के देखो प्यार की आखें,
सब तेरे सब मेरे रे,
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे

गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे,
लहर आए पानी में जैसे धूप-झांव रे

-काबुलीवाला

Friday, December 5, 2008

Which side I am on ?

“I don’t take sides because there are no sides... the only side I am on is ‘This will continue if we don’t learn to forgive’। When you take sides you only see one perspective, and that misleads.”

-Anurag Kashyap

Wednesday, December 3, 2008

मुंबई अटैक !

मुंबई अटैक! जिसने जाने कितने ही बेक़सूर, बेगुनाह लोगों की ज़िन्दगी में हलचल मचा दीवैसे कोई नईं बात तो नही है ऐसे ही मर जाना हमारे देश में लोगों का। हाँ पर मारने का तरीका एकदम चौकाने वाला था। इस बार देश की औधोदिक राजधानी को निशाना बनाया गया है और उसमे भी "होटल ताज" जैसी जगह को जिसे की हमारी मीडिया हम भारतियों के गौरव और सम्मान का प्रतीक बता रही है। वैसे यह मुझे इन हमलों के बात ही पता चला कि होटल ताज का हम देशवासियों के लिए कितना महत्व है।

हमारा देश आज शर्मशार है क्योंकि वो बाहर से आए हमारे विदेशी मेहमानों को सुरक्षा मुहैया नही करवा पाया, जोकि होना भी चाहिएपर काश हमें थोडी शर्म भुकमरी से हमारे देश में मर रहे बच्चों की बात पर भी जातीखैर इन बातों को अभी छोड़ भी दे और इस हमले की ही बात पर गौर करें तो सारी ऊँगलियाँ हमेशा की तरह पाकिस्तान पर उठायीं जा रही है। जैसा कि सियासती गहमा गहमी से साफ़ है, माहौल भी ऐसा बनता नज़र रहा है जैसा कि 9/11 के बाद अमेरिका में अफगानिस्तान के ख़िलाफ़ बन रहा थाचलिए यह बात मान भी लें कि आतंकवादियों ने ट्रेनिंग पाकिस्तान में ली और उसमें उनकी सेना के कुछ लोग भी शामिल रहे थे, पर इसका यह मतलब तो नही कि हम अपनी तरफ़ से पाकिस्तान में चल रहे कैम्पस पर हमला कर दें। और वो भी तब जबकि उस देश के साथ युद्ध का खतरा हो। आज जब समय हमें पाकिस्तान जो ख़ुद आतंकवाद से लड़ रहा है को साथ लेकर इस समस्या से निपटने का है तो इस तरह के विकल्पों पर सोचना बेवकूफी ही होगी।

कुछ लोग इस धारणा को मानते हैं कि हमें पाकिस्तान पर हमला करना चाहिए क्योंकि अमेरिका के अफगानिस्तान पर ऐसा करने के बाद आज तक अमेरिका में कोई बड़ा हमला नही हुआ। उनसे मैं बस यहीं कहना चाहूँगा कि भले ही अमेरिका में कोई हमला नही हुआ पर भारत में तो हुआ। जब मुंबई जल रही थी तो पाकिस्तान में भी बोम्ब फट रहे थे। तो अमेरिका के अफगानिस्तान पर हमले के बाद so called global terror तो कम नही ही हुआ। बल्कि एकदम अलग ही रूप लेकर हमारे सामने आ खड़ा हुआ है। तो यह मान लेना कि पाकिस्तान में चल रहे कैम्पस पर हमला करके हम अपने देश से आतंकवाद को ख़तम कर देंगे, मेरी समझ से तो एक बड़ी भूल है। अगर हमला किया जाता है तो वो बस एक escape route होगा सरकार/ नेताओं के लिए कि उन्होंने कुछ कर दिया हैराजनेता इस बात का सहारा लेकर अपनी नाकामयाबियों पर परदा दाल देंगे और सारा इल्जाम किसी और देश पर मढ़ दिया जाएगा

आतंकवादी हमलों से यहाँ भी आम जनता मरी है और वहां भी आम जनता ही मरेगीकैम्पस में आतंकवादी बैठे नही होंगे, भारतीय हमलों के इंतज़ार मेंआतंकवादियों के ख़त्म होने की बात तो दूर, हमले करके हम आतंकवादियों कि ज़मात में कई नाम और जुडवा देंगे

लम्बी बीमारियों का इलाज़ लंबा होता है। आतंकवाद की समस्या नयी नही है। पर बदकिस्मती ये कि पुराना मर्ज़ होने के बाद भी लोग उसका सही इलाज़ नही ढूँढ पा रहे है। समाज में हर तरफ़ असमानता व भेदभाव है। जिस एक धर्म को इन attacks से जोड़ कर उसे इस्लामिक terrorism का नाम दे दिया गया है, उस धर्म के लोगों की क्या हालत है हमारे समाज में यह किसी से छुपी नही है। लोग कहते हैं ऐसी हालत तो और भी धर्मों को मानने वाले लोगों की है, कई मायनों में उनमे समानता है।

हाँ है, पर उन धर्मों को मानने वाले लोगों को हम terrorist नही बुलाते। उन्हें किराए पर घर और नौकरियां देने से नही हिचकिचाते। उन्हें एक साथ खड़ा देखकर आप सोच में नही पड़ जाते। 100 लोगों की भीड़ से सिर्फ़ एक दाढी और पजामे वाले को ही रोककर उसकी तलाशी नही लेते। दो लोगों का किसी घटना में नाम आने पर उनके गांवों/ शहरों/कॉलेज को आतंकगढ़ का नाम नही दे देते। उनके गली मोहल्लों को मिनी पाकिस्तान नही कहते । उनके केस लड़ने वाले वकीलों की पिटाई नही करते।

कहाँ है समानता? कहाँ है समान न्याय? कैसे रोक सकेंगे हम आतंकवाद को, आंखों में पट्टी बांधकर, बिना न्याय के। और न्याय करना क्या सिर्फ़ अदालतों का काम है? कब हम एक दूसरे से न्याय करना सीखेंगे। कब एक देश के आम आदमी दूसरे देश के आम आदमी से न्याय करना सीखेंगे? कब हम यह जानेंगे कि आतंकवाद से लड़ने की चाबी सरकारों के पास नही, हमारे पास है?

हमारे देश में कई लोगों को पाकिस्तान पर हमला कर आतंकवाद मिटाने की बात का समर्थन करते देखकर तो ऐसा नही लगता की वो दिन पास है। मेरे लिए तो पाकिस्तान में हमला होने की सूरत में मरने वाला आम आदमी भी उतना ही अज़ीज़ होगा जितना कि मुंबई या भारत में कहीं और हुए हमले में मरे लोग।

Tuesday, October 28, 2008

हमारी साँसों के पहरेदार

कितना जरूरी है हम सभी के लिए साँस लेना ऐसी साँस जो साफ़ भी हो मुझे याद हैं इस साल जब हमारे नए साथियों ने होस्टल ज्वाइन किया तो सबसे पहले उनका स्वागत हाल में फैले गंदे पानी और बदबू ने किया था सीवर लाइन जाम हो जानेसे फैले गंदे पानी से उठ रही सडांध ने लोगों का अपने रूमों और हॉस्टल में रहना ही दूभर कर दिया था उस दौरान ऐसे द्रश्य आम थे जहाँ लोग रूमालों से अपनी अपनी नाक दबाये HEC, हाल ऑफिस और ना जाने किस किसको कोसते नज़र आते थे कईओं ने तो परेशान होकर वार्डेन, DoSA सभी को ईमेल भी ठोक दिया

खैर एक दिन बदबू जाती रही सब ठीक कर दिया गया और लोगों की साँस में साँस आयी चार दिनों में शायद हम सभी को यह एहसास हो गया कि अगर साँस बदबूदार हो तो कितनी भारी लगती है और कितनी बैचैनी पैदा करती है अब ज़रा सोचिये कि जिस आदमी का काम ही बदबूदार गन्दगी को साफ़ करना हो तो उसकी हर साँस कितनी भारी होगी? जी हाँ, यह लेख उन्हीके बारे में है जो हमारी साँसों को बदबूदार और भारी होने से बचाते हैं वो जो हमारी साँसों के पहरेदार हैं

पिछले कुछ समय से मैं IIT में काम कर रहे सीवर लाइन सफाई कर्मचारियों के संपर्क में रहा हूँ। इनका काम हम सबके लिएकितना महतवपूर्ण है, जाने यह बात हम में से कितने लोग जानते और मानते हों। पर इनके काम करने के तरीके और इनकीकार्य स्थिति के बारे में जानकारी और समझ शायद कुछ एक के ही पास हो जो थोडी बहुत समझ इनके काम और इनकी working condition के बारे में मैं बना पाया हूँ, वो इस लेख के माध्यम से आप सभी से बांटना चाहूँगा उम्मीद है की आप अपनी साँसों के पहरेदारों का हालचाल जानने में interested हैं

क्या कहते हैं आंकड़े ?

आइये सबसे पहले शुरुआत आंकडों से ही करते हैं आज की तारिख में में हमारे पूरे कैम्पस में सीवर लाइन की सफाई, उनसेजुड़ी शिकायतों उनकी देखरेख करने के लिए केवल 4 daily wage workers कर रहे हैं अगर इसकी तुलना हॉस्टल मेंचल रहे और कामों से की जाए तो एक अलग ही तस्वीर उभरती है
काम

Workers की संख्या

Workers/person

मेस

50 हर एक मेस में

50/400 = 1/8

सफाई कर्मचारी

1 हर एक ब्लाक में

1/54

माली

4 हर एक हाल में

4/400 = 1/100

सीवर सफाई कर्मचारी

4 पूरे कैम्पस में

4/8000 = 1/2000

माना की पूरे कैम्पस की जनसँख्या 8000 है यानी कि हर 2000 लोगों पर एक सफाई कर्मचारी दिल्ली और मुंबई में यहीआंकडा तकरीबन 270 और 439 लोगों पर एक सीवर सफाई कर्मचारी का है इन आंकडो से संस्थान कि सीवर सफाईकर्मचारियों के प्रति उदासीनता साफ़ झलकती है। जहाँ एक और उपरी सुन्दरीकरण से जुड़े कामों को करने के लिए तमामकर्मचारी हैं वहीँ दूसरी और सीवर सफाई के लिए मात्र 4


IIT में कुछ सालों पहले तक इस काम के लिए स्थाई कामगार (permanent workers ) भी थे जब संस्थान ने उनकी भरतीबंद कर दी तो डेली वेज कामगार काम पर लगाये जाने लगे। इन चारों कामगारों में से तीन तो 1989 या 90 के समय से ही संस्थान में काम कर रहे हैं शुरू में इन्हे भी शायद सीधे ही काम पर लगाया हो (आज के मेस डेली वेज workers की तरह) परजैसे जैसे संस्थान में ठेका प्रथा ने जोर पकड़ा, इन कामों को भी ठेके पर दिया जाने लगा गौर तलब बात यह है की इन कामगारों के ठेकेदार तो बदले पर ये लोग पिछले 18-20 सालों से लगातार संस्थान में काम कर रहे हैं

एक और बात जो गौर करने लायक है वो यह की जिस समय इस काम को करने के लिए permanent workers भी थे उससमय सीवर सफाई कर्मचारियों की संख्या 10 के आसपास होती थी और कैम्पस की जनसँख्या आज की अपेक्षा कम हुआकरती थी। पर आज जनसँख्या बढ़ने के साथ इन कामकारों की संख्या घटा दी गयी है।

उनके साधन, औजार और खतरे

काम के दौरान इनके द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले औजारों में बांस की एक खपच्ची या फंटी और लोहे की एक छड़ होती है और इनका भी इन्तेजाम उन्हें ख़ुद ही करना पड़ता है इसके अलावा इन्हे ऐसा कुछ भी उपलब्ध नही करवाया जाता जोकि इनके काम को आसान बना सके नाही इन के पास दास्ताने होते हैं और ना ही जूते

ये सीवेज मेनहोल कभी कभी 20 फुट गहरे भी होते हैं और वो भी उपर तक भरे हुए और जब सीवरों को जाम करने वालाकचरा बांस की फंटीयों से नही निकलता तो इन काम्गार्रों को इन सीवरों में उतरना पड़ता है जी हाँ, सदी हुई गन्दगी सेबदबूदार हुए और तमाम जहरीली गैसों से भरे हुए सीवरों में

ये नंगे बदन सिर्फ़ एक कच्छा डाले हुए इन नालियों जिसमें की बहने वाली गन्दगी को देखकर हम आप नाक भों सिकोड़ने लगतेहैं, में घुसते है और उन्हें साफ़ करते हैं

इस सीवरों में जो सबसे खतरनाक चीज़ होती हैं वो है सीवर गैस या हाइड्रोजन सल्फाईड सडे अण्डों सी बदबू वाली यह गैससीधे दिमाग को पहुंचने वाली आक्सीजन पर हमला करती है इसके अलावा जो सबसे बड़ा खतरा है वो है मीथेन गैस ।जहरीली होने के साथ साथ यह विस्फोटक भी होती है इस गैस का पता लगाने का कोई भी यंत्र इस कामगारों को उपलब्ध नहीहै जिस वजह से यह अपने ही कुछ तरीके अपनाते हैं मनेहोल में घुसाने से पहले वो उसका ढक्कन कुछ देर के लिए खोल देतेहैं और फिर माचिस की तीली फेंककर इस गैस का पता लगाते हैं

एक साधन जो इनके मुताबिक इस काम से जुड़े खतरों और कठिनाइयों से लड़ने में इनकी मदद करता है वो है शराब शराब पीकर काम करना इनके लिए कोई नयी बात नही ये सफाई कर्मचारी शराब पीना अपनी मजबूरी बतलातें हैं उम्दा यंत्रों और सुरक्षा साधनों के अभाव में शायद शराब ही उनका आखिरी सहारा है अपने "गंदे" काम को करते समय भी यह शराबपीये रहते हैं ताकि ध्यान रहे की क्या कर रहे हैं

कुछ हादसे

एक आंकड़े के अनुसार पिछले 17 सालों में उग्रवाद से पीड़ित जम्मू और कश्मीर में सुरक्षा बालों और पुलिस के करीब 5100 जवान मारे गए हैं वहीँ दूसरी और अकेले मुंबई में ही पिचले 17 सालों में हुई सफाई कर्मचारियों की मौतों का आंकडा एकअनुमान के मुताबिक 6800 का है यह इस देश की विडम्बना ही कही जायेगी की सोनू और उस जैसे छोटे बच्चों की बोरेवेल मेंफंसने पर पूरा देश टीवी पर आँखें गडा कर बैठ जाता है, संसद हिलने लगती है पर इन सफाई कर्मचारियों की मौतें एक भीब्रेकिंग न्यूज़ नही बनाती


अगर आप इन सफाई कर्मचारियों से बात करें तो ये सभी कम से कम एक ऐसी जानलेवा घटना तो बता ही देंगे जोकि इनके साथ घटी हो एक को तो हमारे डायरेक्टर बंगले में ही खतरनाक गैस लग गयी थी इनमें से एक आज भी अपने साथ सन 89 में काम के दौरान हुए एक एक्सीडेंट जिसमें की उसके पैरों की दो ऊँगलियाँ कट गयीं थी का मेडिकल पर्चा लेकर घूमता है उस घटना का उसे कोई भी मुआवजा नही मिला खैर जिस जगह इन सफाई कर्मचारियों को जरूरी संसाधन और सुरक्षा के बेसिक साधन उपलब्ध नही करवाए जाते, वहां चोट लगने पर इलाज़ और मुआवजे की दरकार बेमानी लगती है

हमारे संस्थान में ही पिछले साल ठेका मजदूरों से जुड़ी तीन मौतों की घटनाएँ सामने आयीं थी ठेका मजदूरों को लेकर संस्थान की नीतियों को देखकर एक कहावत याद आती है कि "जब आग लगे तब कुँआ खोदा जाए" क्योंकि तमाम कमेटियां बनीं, लोगों ने हल्ला भी किया पर जाने क्या किया गया कामगारों के सुरक्षा इंतजामात को लेकर आज भी सीवर सफाई कर्मचारी अपने पुराने तरीकों और साधनों से ही काम कर रहे हैं

मुझे बचपन में बताया गया था कि कोई भी काम छोटा या गन्दा नही होता समाज में हर काम का महत्व है पर अगर समाज और समाज में रहने वाले लोग ऐसे किसी काम का महत्व ना समझें और इन्हे करने वाले लोगों को हिकारत से देखें, उसे उचित समान दें तो कोई क्यों भला अपने काम को अच्छा कहेगा यह भी अपने काम को गन्दा कहते हैं पिछले कई सालों से दिनभर पूरी IIT की सफाई करने के बाद उन्हें मिलता ही क्या है ? सिर्फ़ मिनिमम वेजेस और वो भी unskileed श्रेणी में

20 सालों से लगातार एक ही काम करने के बाद भी unskilled, वाह री IIT कुल मिलाकर उन्हें हर महीने तकरीबन 4000 रुपये मिलते हैं अमेरिका के न्यूयार्क शहर में एक सफाई मजदूर की शूरूआती पगार ही करीब 2500 डॉलर प्रतिमाह होती है जो कि सालों में दोगुनी हो जाती है


एक graduate student को किसी US यूनिवर्सिटी में 1500-2000 डॉलर प्रतिमाह मिलते हैं हमारे देश में यह रकम 15000 रुपये है साफ़ ज़ाहिर है कि उस में सीवर सफाई का काम एक जटिल और ज़रूरी काम माना जाता है वहीं हमारे देश में तमाम असुरक्षाओं के बावजूद यह काम मात्र 4000 रुपये दिलवा पाता है, जो कि आज की इस महंगाई में बस पेट भरने के लिए ही काफ़ी है

यह स्थिति मेरे दिमाग में एक प्रश्न उठाती है कि क्या ये काम कोई भी कर सकता है ? मैं तो नही कर सकता और यकीनन इनके सर पर बैठे सुपरवाइज़ार और ठेकेदार भी नहीं फिर ये काम unskilled या semiskilled काम कैसे हो सकता है ये काम तो highly skilled काम है ये और ना जाने ऐसे ही कितने सवाल इस कामगारों के मन में भी उठते ही होंगे और उन्हें कचोटते होंगे

मेरे पिताजी कोयले कि खदानों में काम करते हैं बचपन में जब वो काम पर जाते तो मुझे एक अजीब सा डर लगा करता था जब शाम को वो घर वापिस जाते तो तब हिमेरी बेचैनी मिटती कुछ सालों पहले मैं उनके साथ एक खदान में गया , तब मेरी समझ में आया कि सच में कितना खतरनाक है उनका शायद यही सब सोचकर उन्होंने हमेशा मुझसे कहा कि कहीं भी काम कर लेना पर कोयला खदानों में मत करना शायद यह सफाई कर्मचारी भी अपने बच्चों से यही कहते हों पर जब इन तीनो के साथ मैंने चौथे सफाई कर्मचारी को देखा तो मेरे इस ख्याल पर एक सवालिया निशान लग गया वो चौथा इनमे से एक का ही बेटा है, जाने क्या मजबूरी हैं उस बाप कि जो जानते बूझते हुए अपने बेटे को इस खतरनाक काम में लगा रहा है

* अमेरिका, मुंबई और दिल्ली के आंकड़े तहलका में छपे एक article से साभार।